वैसे दुनिया में देश तो बहुत सारे हैं ।
उनमें से कुछ आधे तो कुछ पूरे पागलपन से मतवाले हैं ।
इस दुनिया के अधिकांशतः देश तो डर से पगला गए है और इसीकारण शायद हर देश में जनसंख्या से ज्यादा हथियार आ गये है ।
और जनाब हथियार भी कोइ एसे वैसे नहीं है एटम बम हैं एटम बम
जो दिखने में तो बहुत छोटा है
लेकिन यकीन मानिये कि सब हथियारों में सबसे ज्यादा खोटा है ।
और तो और ये अपने खोटेपन को बताने के लिए कुछ यूं है अड़ा
कि जो ये एक बार फटा तो दूसरे बम के लिए फिर कोइ ना बचा ।
और जब इस पागलपन को मिटाने की दवा मैंने खोजी
तब यह बात मेरे ख्याल में आयी कि इस पागलपन कि दवा आज की तारीख में सिर्फ एक ही देश में मौज़ूद है।
पर भली मेरी किस्मत, क्या करें ! बुरी संगत का असर ही कुछ ऎसा है
कि जिस देश के पास इसकी दवा है, वही इस रोग में फसा है ।
हाँलाकि उस देश की धरती के कण कण में आज भी,अभी भी इस रोग को मिटाने वाली दवा के तत्त्वों का वजूद है ।
बस जरूरत उसे पहचान कर अपनाने कि है वरना हम सबका वजूद भी खतरे की सीमा रेखा के अंदर ही मौज़ूद है ।
दोस्तो, वह दवा कुछ और नहीं मात्र प्रेम और विश्वास से भरी ५०० एम. एल. की मीठी गोली है
जो दुनियाभर के लिए मात्र भारत देश में आज भी मौज़ूद है ॥
उनमें से कुछ आधे तो कुछ पूरे पागलपन से मतवाले हैं ।
इस दुनिया के अधिकांशतः देश तो डर से पगला गए है और इसीकारण शायद हर देश में जनसंख्या से ज्यादा हथियार आ गये है ।
और जनाब हथियार भी कोइ एसे वैसे नहीं है एटम बम हैं एटम बम
जो दिखने में तो बहुत छोटा है
लेकिन यकीन मानिये कि सब हथियारों में सबसे ज्यादा खोटा है ।
और तो और ये अपने खोटेपन को बताने के लिए कुछ यूं है अड़ा
कि जो ये एक बार फटा तो दूसरे बम के लिए फिर कोइ ना बचा ।
और जब इस पागलपन को मिटाने की दवा मैंने खोजी
तब यह बात मेरे ख्याल में आयी कि इस पागलपन कि दवा आज की तारीख में सिर्फ एक ही देश में मौज़ूद है।
पर भली मेरी किस्मत, क्या करें ! बुरी संगत का असर ही कुछ ऎसा है
कि जिस देश के पास इसकी दवा है, वही इस रोग में फसा है ।
हाँलाकि उस देश की धरती के कण कण में आज भी,अभी भी इस रोग को मिटाने वाली दवा के तत्त्वों का वजूद है ।
बस जरूरत उसे पहचान कर अपनाने कि है वरना हम सबका वजूद भी खतरे की सीमा रेखा के अंदर ही मौज़ूद है ।
दोस्तो, वह दवा कुछ और नहीं मात्र प्रेम और विश्वास से भरी ५०० एम. एल. की मीठी गोली है
जो दुनियाभर के लिए मात्र भारत देश में आज भी मौज़ूद है ॥
✍🏻 साकेत जैन शास्त्री 'सहज'
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