Sunday, March 8, 2020

धर्म और कुप्रथाएँ

कोई भी संस्कृति हमारे द्वारा सीखे गये विचार और विवेक के आधार पर आगे बढ़ती है जिसमें, विचार जो कि हमें दिशा देते है वह शास्त्रों के आधार से मिल सकते हैं पर विवेक जो कि हमारी दशा सुनिश्चित करता है वह हमें पीढ़ी दर पीढ़ी परम्परा से मिलता है और भारतवर्ष धर्म और परम्पराओं का देश है । सदियों से यहाँ अनेक संस्कृतियों का वास रहा, आज तक न जाने कितनी ही संस्कृतियों ने यहाँ अपने पैर पसारे और न जाने कितनी ही संस्कृतियाँ काल ले गाल में समा गयी । इन विभिन्न प्रकार की संस्कृतियों तथा धर्मों के प्रभाव से हमारे देश में अनेक प्रकार की नीतियाँ तथा रीतियाँ प्रचलन में आई और कितनी ही चली गयी । इनमें से कुछ रीति-नीतियाँ सामाजिक थी तो कुछ धार्मिक । जब ये रीति-नीति कुछ अधिक काल तक लोगों के आचरण में जीवित रह गयी तो लोगों ने इन्हें प्रथाओं के नाम दे दिया ।
हालाँकि हर सामाजिक एवं धार्मिक प्रथा को प्रारंभ करने के पीछे एक ठोस वजह थी लेकिन यह वजह हर उस इंसान तक नहीं पहुँच पाती थी जो इन प्रथाओं का पालन करते थे । यही कारण रहा कि प्रथा के पीछे की वजह और प्रामाणिकता खत्म होने के बाद भी प्रथा चलती रही और बिना विचार-विवेक के साथ चलते रहने के कारण अब ये प्रथाएँ रूढ़िता का रूप ले चुकी हैं जो विवेकशून्य क्रिया अर्थात् ढोंग के अलावा और कुछ नहीं हैं ।
आसान भाषा में कहें तो कोई भी प्रथा क्यों प्रारंभ हुई, उसका कैसे, क्यों और कब तक निर्वाह करना चाहिये । इन बातों पर विवेक पूर्वक विचार न करने से, प्रथाओं की अपनी प्रामाणिकता को खो देने से और जनता के अंधानुसरण के कारण ही ये प्रथाएँ धीरे-धीरे कुप्रथाओं मे बदल गईं । परन्तु इसमें सारा दोष जनता का ही नहीं है, दोष हमारी शिक्षा प्रणाली का भी है जो परतंत्रता की अवस्था में मुगलों और अंग्रेज़ों के द्वारा इसतरह बदल दी गयी कि अब पढ़ाई-लिखाई करने के बाद हम नाम से तो जैन कहलाते हैं पर अंतरंग से हम ईसाई (क्रिश्चियन) या अन्य मतावलंबियो जैसे होते जा रहे हैं ।।
कहते हैं "धर्म परिभाषा नहीं प्रयोग है" पर जब हमने हमारे धर्म के बारे में कुछ पढ़ा-सुना ही नहीं तो हम उसका प्रयोग कैसे कर पाएँगे ....? यह बात हमारे और आपके के लिए विचारणीय है। उदाहरणस्वरूप राजा वसु जिन्होंने गुरुमाता की पक्षग्राहिता के कारण अज का अर्थ सूत्र में चावल बताया है यह पता होने पर भी चावल के स्थान पर बकरा बताया जिसकारण आगे जाकर पशु बलि की प्रथा चली । अब जब यह प्रथा प्रारंभ हुई तब किसी ने भी इसके पीछे का सही कारण या इतिहास जानने का न प्रयास किया न ही विचार किया कि मूक पशुओं की बलि से किसका भला हो सकता है सो यह प्रथा अंधानुसरण के कारण आज भी चल रही है जो की कुप्रथा है । 
           आप अपने आस-पास ऐसे ढेरों उदाहरण देख सकते हैं जिनका आज के प्रसंग में कोई औचित्य नहीं है तथा उनसे बच भी सकते हैं बस जरूरत है कि आप अपने विचारों का उपयोग विवेकपूर्वक करें। साथ ही कुल परंपरा से धर्म के आग्रही न बनकर सच्चे धर्म की खोज करें । 
 इस लेख के माध्यम से आप अप‌ने विचारों को विवेक के पंख प्रदान करेंगे बस यही मंगल भावना है । 

साकेत जैन शास्त्री

Wednesday, January 1, 2020

एक पैगाम आपके नाम...

नमस्कार दोस्तो,

मुझे नहीं पहचाना ! कैसे पहचानोगे, अरे आज जब मैं अपने-आप को आईने में देखता हूँ तो मैं ही अपने-आपको नहीं पहचान पाता हूँ, तो आप मुझे कैसे पहचानोगे ? दरअसल क्या है न ! जैसे एक बच्चा बचपन में कितना प्यारा लगता है लेकिन बड़े होते-होते देखो, उसका पूरा हुलिया ही बदल जाता है । बस ! कुछ यही हाल मेरा है ।

अभी भी लगता है कि शायद पूरी बात समझ नहीं आई, चलो ! विस्तार से बताता हूँ..........

आज से बहुत सालों पहले इस धरती पर मेरा स्वतंत्र अस्तित्व था । कोई और ऐसा न था जो मुझ पर राज करता हो । मैं अपने-आप का राजा था और मेरा क्षेत्रफल भी बहुत बड़ा था, लेकिन समय बलवान होता है । धीरे-धीरे बाहर के लोगों ने मुझे पहचाना, पहले तो वे मेरे पास आए और उन्होंने मेरे साथ काम करना चाहा तो मैंने सोचा इसमें क्या बुरा है यह तो अच्छी बात है मिलकर काम करेंगे तो ज्यादा काम कर पाएँगे और दो अच्छी बातें और सीखेंगे सो अलग !

इस चक्कर में मैंने दूसरों के साथ काम करना शुरू कर दिया लेकिन मेरी सोच का लोगों ने गलत अर्थ निकाला और धीरे-धीरे उन्होंने मेरे साथ काम करने के बजाय मुझे इस्तेमाल करना शुरू कर दिया क्योंकि अब हम साथ काम नहीं करते थे वो काम बताते थे और मैं काम करता था यानी कि अब वे मेरे मालिक बन बैठे थे और मैं उनका नौकर !

जब मुझे इस बात का एहसास हुआ तो मैंने विद्रोह किया और सफल भी हुआ । फिर मैंने उनके साथ काम करना बंद कर दिया लेकिन ऐसा एक बार नहीं, बार-बार हुआ; जब साथ काम करने और कुछ अच्छा नया सीखने की चाह में मैं औरों का गुलाम बन बैठा । हालांकि बाद में मैं स्वतंत्र हो जाया करता था लेकिन इस पराधीनता का नुकसान मुझे बहुत उठाना पड़ा और एक समय तो ऐसा आया जब मेरे साथ काम करने आए लोगों ने मुझे लम्बे अरसे तक गुलामी की जंजीरों में जकड़े रखा और जंजीरों से मुक्त भी किया तो अपाहिज बना कर !

हाँ ! उन्होंने मेरे अंदर बहने वाले ज्ञान के लाखों स्रोत ऐसे गुरुकुलों को जला डाला, लाखों शास्त्रों को जला डाला, मेरी भाषाओं को मेरे बच्चों के ज़हन से दूर कर दिया, यहाँ तक कि मेरी ही भाषाओं के प्रति ऐसा जहर घोल दिया कि आज यह तक सुनने में आ जाता है कि हिंदी-संस्कृत भाषाओं को बच्चे ओछा समझते हैं उनको बोलने-पढ़ने में उन्हें शर्म महसूस होने लगी है तब मन दुखी होता है ।

बात यहीं नहीं थमीं वे विकास के नाम पर अपनी नयी शिक्षा पद्धति से संस्कारों व वात्सल्य भावना  से विहीन स्वार्थपूर्ण, रूखी  व निष्ठुर विचारधारा मेरे बच्चों के मन-मष्तिष्क में भरते गये और मेरी संस्कृति और सभ्यता पर निरंतर चोट करते रहे ।

इसी का परिणाम है कि आज मेरे बच्चे मेरा नववर्ष ही भूल गए हैं, न सिर्फ नववर्ष अपितु कई सारे त्योहार, पर्व, आयोजन इत्यादि उन्हें याद ही नहीं हैं । उन्हें बस अंग्रेज़ी कैलेंडर वाला नववर्ष ही याद रहता है फिर भी मैं अपनी गुणग्राहकता की पुरानी आदत के कारण आज भी आपको इस नववर्ष की हार्दिक बधाइयाँ दे रहा हूँ क्योंकि दूसरों को गलत ठहराना या उनका विरोध करने की आदत मेरी कभी नहीं रही । लेकिन एक बात जरूर कहूँगा कि दूसरों के खातिर अपने को नहीं भूलना चाहिए  क्योंकि आज यह स्थिति बन गई है दूसरों का आदर करते-करते मेरा अपना आदर कहीं खो गया है दूसरों की इज्जत करते-करते मेरी अपनी इज्जत ही खो गई है दूसरे से अच्छी बातें सीखने के चक्कर में मेरी अपनी अच्छी बातें ही ना जाने कहाँ लुप्त हो गई हैं ।

ऊँचाइयों को छूने की चाहत में मैंने अपनी पतंग की डोर दूसरे के हाथ में थमा दी थी और यही कारण रहा कि विकास की चाह में डोर कभी इस हाथ तो कभी उस हाथ अर्थात् कभी इसकी गुलामी तो कभी उसकी गुलामी और गुलामी के बाद आजादी मिली भी तो ऐसी जैसे डोर काट के छोड़ दी हो, सो मेरी पतंग गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, तनाव, आक्रोश, आतंकवाद और ऐसी ढेरों समस्याओं की खाई में जाकर गिर पड़ी । आज अपनी पुरानी धरोहरों का अध्ययन करता हूँ तो ख्याल आता है कि ऊँचाईयों को छूने की चाहत हो तो पेड़ की तरह जमीन में गड़ना पड़ता है तभी शायद पेड़ की तरह सदियों तक ऊँचाईयों पर बने रह पायेंगे । इतना मिटाने पर भी जितना मैं आज बचा हूँ वो इसीकारण कि पहले मैंने जितनी ऊँचाइयों को पाया वो पेड़ की तरह जमीन में गड़ कर तथा अपनी जड़ों को मजबूत बनाकर ही छू पाया जो आज तक किसी न किसी रूप में बरकरार है । यदि आगे भी मुझे अपना अस्तित्व बरकरार रखना है तो पुनः अपनी जड़ों के पास जाना होगा । इस नये वर्ष पर आप मुझे अपनी जड़ों के पास ले जाने में मदद करोगे इसी भावना से अपनी बात पूरी करता हूँ ।

आपका प्यारा भारतवर्ष
कृपया भारतवर्ष का यह निवेदन हर भारतवासी तक पहुँचाए...

✍ साकेत जैन 'सहज' शास्त्री

Thursday, November 14, 2019

दुनिया में बहुत बड़े हो जाओ तब भी अपना बचपना नहीं खोना ....... Happy Children's Day

दुनिया का सबसे सुंदर रूप बच्चों का है और हमारी ज़िंदगी का सबसे सुनहरा काल भी बचपन का ही होता है इसलिए जब इस बाल दिवस पर मैंने अपने और अपनों के जीवन में झाँक कर देखा तो बहुतों का जीवन देखने मिला, बस वही बातें आपसे सांझा कर रहा हूँ -

सोचो अगर बच्चे ना होते तो क्या होता ...?

फिर कौन होता जो चांद को मामा कह कर बुलाता ।
और ना सिर्फ मामा कहकर बुलाता बल्कि उसके साथ खेलने के लिए अपनी माँ को भी सताता ।

फिर कौन होता जो सुबह-सुबह सूरज से निकलने वाली धूप और उसमें दिखने वाले छोटे-छोटे कणों को अपनी डिबिया में सहेजता ।
और घर से बाहर निकलने पर राह चलते उन सड़क के पत्थरों को भी  अपना प्यार भेजता ।

फिर कौन होता जो बारिश के अंदर सड़कों पर बने छोटे-छोटे स्विमिंग पूल में छपाक कर के उतर जाता ।
और फिर उसी को छोटा तालाब बनाकर उसमें अपनी कश्ती चलाता ।

फिर कौन होता जो समुद्र किनारे पड़ी रेत में अपना किला बनाता ।
और उस किले के इर्द-गिर्द अपनी छोटी सी रियासत बनाकर अपना साम्राज्य चलाता ।

फिर कौन होता जो अपने कल्पना के रथ पर सवार हो परियों के पास जाता ।
और उनसे सुंदर कहानियों का गुच्छा धरती पर उतार लाता ।

फिर कौन होता जो माँ के सुबह-सुबह उठाने पर नखरे दिखाता ।
और स्कूल जाने के नाम पर अपनी माँ को भी उसकी खुद की माँ की याद दिलाता ।

फिर कौन होता जो सर्दियों में सुबह उठकर मुँह से भाप निकालता नयी नयी आकृतियाँ बनाता ।
और ठंडे पानी से नहाने के नाम पर अपने दांतो को कटकटाता ।

फिर कौन होता जो घर के सारे तकियों और चादरों को जोड़ अपना एक प्राइवेट रूम बनाता ।
और उसमें छोटी-सी टॉर्च जलाकर अपने भाई-बहनों को भूतों की कहानियाँ सुनाता ।

फिर कौन होता जो नानी दादी की कहानी में अपने लिए नए-नए किरदार ढ़ूँकता ।
और जो कुछ नहीं बोल पाते ऐसी बेजान बेज़ुबा वस्तुओं में भी जान फ़ूँकता ।

फिर कौन होता जो कागज के छोटे-छोटे टुकड़ों में अपने सीक्रेट छुपाता ।
और अपने सपनों को काँच के टुकड़ों में भी आईना दिखा चाँद से रेस लगाता ।

दरअसल यहां हम सब जितने भी हैं कुछ अधेड़ कुछ जवान कुछ युवा बच्चे हैं ।
पर हकीकत यही है कि यहां कुछ ही हैं जो सिर्फ बच्चे हैं ।

ये बच्चे हैं जनाब -
भोली सी मुस्कुराहट में अपनी सारी शैतानियां छुपा लेते हैं ।
और बड़ी से बड़ी समस्या हो तो भी छोटी-छोटी बातों में खुशियों का फल उगा लेते हैं ।

ये बच्चे न होते तो क्या होता ।
होता क्या ...
ये आँगन वीरान होता ।
न आप यहाँ होते, न मैं होता ।
इसलिए हमें फिर एक बार सोचना चाहिए कि यदि बच्चे न होते तो क्या होता ।

✍🏻 साकेत जैन 'शास्त्री' सहज

Thursday, October 24, 2019

धन्य थी वह तेरस.....

धन्य था वह तेरस का दिन जब भगवान महावीर का अंतिम उपदेश दिव्यध्वनि के द्वारा भव्य जीवों ने श्रवण किया और उनमें भी धन्य थे वे लोग जिन्होंने उस उपदेश को सुनकर अपना आत्मकल्याण किया, जिन्होंने अपने ज्ञान में निज शुद्धात्म तत्त्व के दर्शन किए और अंतर की मस्ती में मस्त हि गये ।
निश्चित ही भगवान की वाणी का सार- जीव जुदा पुद्गल जुदा... ऎसी भेदज्ञान प्रगटाने वाला वीतराग विज्ञानमयी ही होगा । आइए, हम भी अपने जीवन में इस धन्यता को प्रकट करें । इस भेदज्ञान को प्रगट करके वीतराग-विज्ञानता को अपने उर में ऊर्ध्व कर भगवान महावीर के न सिर्फ सच्चे पथानुयायी बनें अपितु स्वयं उन जैसे बनेंं...............।

इसी मंगल भावना के साथ धन्य तेरस की आपको और आपके परिवार को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ ।


साकेत जैन शास्त्री 'सहज'

Wednesday, September 4, 2019

अर्पण है यह पहचान नयी

शिक्षक दिवस के अवसर पर इस दुनिया में मुझे जितने भी लोगों से छोटी से छोटी कोई भी बात सीखने का अवसर मिला, उन सभी गुरुओं को मेरी तरफ से समर्पित है मेरी एक छोटी सी कविता -

मैं गुरुओं की महिमा गाँऊँ,
उनके उपकार को बतलाऊँ ।
किन शब्दों में किन लफ़्ज़ों में,
मैं उनका अभिनंदन गाँऊँ ।

उनने ही चलना सिखलाया,
बोलूँ क्या उनने बतलाया ।
कैसे व्यवहार करूँ जग में,
यह उनने ही तो समझाया ।

मैं चाहूँ तो, ना चाहूँ तो,
बतला कर भी बतलाऊँ तो ।
मैं क्या-क्या बदला पाऊँगा,
सूरज को दीप दिखाऊँगा ।

जिसने मुझ अदने बालक को,
इस जग में दी पहचान नयी ।
ऐसे अपने उन गुरुओं को,
अर्पण है यह पहचान नयी ।

  साकेत जैन शास्त्री 'सहज'

Thursday, August 15, 2019

बंधनों में बंधन - रक्षाबंधन

दुनिया में देखो भैया बंधन बहुत सारे
चारों ओर बंधनों का ही तो बोल बाला है ।
बंधन भी भिन्न-भिन्न कैटेगिरी के यहाँ पै
छोटे बड़े मोटे पतले सबका खज़ाना है ।।

इक माता दूजा पिता तीजा बंध बहिन का
चौथा ननिहाल पाँच दादा-दादी घर का ।
छठा गुरु सप्त मित्र अष्ट बंध दम्पति का
नौवाँ बंध अपना-अपना धन्धा-पानी घर का ।।

बंधनों में तीजा बंध रक्षाबंधन नाम पाया
भैया और दीदी ने हाँ रिश्ता निभाया ये ।
इसमें है प्यार बड़ा वात्सल्य साथ जुड़ा
जात पात भेदभाव सबको हराया ये ।।

दुनिया भी सुख और शांति को ही चाहती है
इसीकारण रक्षाबंधन सर्वोपरि आया है ।
बंधनों में ये है सर्वश्रेष्ठ बंध दुनिया का
सर्वधर्मियों ने बस ये ही अपनाया है ।।

सारे बंधनों को पूरी दुनिया ने मान लिया
बंध की ही कथा से तो विसंवाद फला है ।
बंधनों से पार एक आत्मा की शरण से
बंधनों से मुक्त देखो शिव पंथ भला है ।।

✍🏻 साकेत जैन शास्त्री 'सहज'

बीमारी अनेक, इलाज़ एक - भारत देश

वैसे दुनिया में देश तो बहुत सारे हैं ।
उनमें से कुछ आधे तो कुछ पूरे पागलपन से मतवाले  हैं ।

इस दुनिया के अधिकांशतः देश तो डर से पगला गए है और इसीकारण शायद हर देश में जनसंख्या से ज्यादा हथियार आ गये है ।

और जनाब हथियार भी कोइ एसे वैसे नहीं है एटम बम हैं एटम बम
जो दिखने में तो बहुत छोटा है
लेकिन यकीन मानिये कि सब हथियारों में सबसे ज्यादा खोटा है ।

और तो और ये अपने खोटेपन को बताने के लिए कुछ यूं है अड़ा
कि जो ये एक बार फटा तो दूसरे बम के लिए फिर कोइ ना बचा ।

और जब इस पागलपन को मिटाने की दवा मैंने खोजी
तब यह बात मेरे ख्याल में आयी कि इस पागलपन कि दवा आज की तारीख में सिर्फ एक ही देश में मौज़ूद है।

पर भली मेरी किस्मत, क्या करें ! बुरी संगत का असर ही कुछ ऎसा है
कि जिस देश के पास इसकी दवा है, वही इस रोग में फसा है ।

हाँलाकि उस देश की धरती के कण कण में आज भी,अभी भी इस रोग को मिटाने वाली दवा के तत्त्वों का वजूद है ।
बस जरूरत उसे पहचान कर अपनाने कि है वरना हम सबका वजूद भी खतरे की सीमा रेखा के अंदर ही मौज़ूद है ।

दोस्तो, वह दवा कुछ और नहीं मात्र प्रेम और विश्वास से भरी ५०० एम. एल. की मीठी गोली है
जो दुनियाभर के लिए मात्र भारत देश में आज भी मौज़ूद है ॥

✍🏻 साकेत जैन शास्त्री 'सहज'

धर्म और कुप्रथाएँ

कोई भी संस्कृति हमारे द्वारा सीखे गये विचार और विवेक के आधार पर आगे बढ़ती है जिसमें, विचार जो कि हमें दिशा देते है वह शास्त्रों के आधार ...