दुनिया का सबसे सुंदर रूप बच्चों का है और हमारी ज़िंदगी का सबसे सुनहरा काल भी बचपन का ही होता है इसलिए जब इस बाल दिवस पर मैंने अपने और अपनों के जीवन में झाँक कर देखा तो बहुतों का जीवन देखने मिला, बस वही बातें आपसे सांझा कर रहा हूँ -
सोचो अगर बच्चे ना होते तो क्या होता ...?
फिर कौन होता जो चांद को मामा कह कर बुलाता ।
और ना सिर्फ मामा कहकर बुलाता बल्कि उसके साथ खेलने के लिए अपनी माँ को भी सताता ।
फिर कौन होता जो सुबह-सुबह सूरज से निकलने वाली धूप और उसमें दिखने वाले छोटे-छोटे कणों को अपनी डिबिया में सहेजता ।
और घर से बाहर निकलने पर राह चलते उन सड़क के पत्थरों को भी अपना प्यार भेजता ।
फिर कौन होता जो बारिश के अंदर सड़कों पर बने छोटे-छोटे स्विमिंग पूल में छपाक कर के उतर जाता ।
और फिर उसी को छोटा तालाब बनाकर उसमें अपनी कश्ती चलाता ।
फिर कौन होता जो समुद्र किनारे पड़ी रेत में अपना किला बनाता ।
और उस किले के इर्द-गिर्द अपनी छोटी सी रियासत बनाकर अपना साम्राज्य चलाता ।
फिर कौन होता जो अपने कल्पना के रथ पर सवार हो परियों के पास जाता ।
और उनसे सुंदर कहानियों का गुच्छा धरती पर उतार लाता ।
फिर कौन होता जो माँ के सुबह-सुबह उठाने पर नखरे दिखाता ।
और स्कूल जाने के नाम पर अपनी माँ को भी उसकी खुद की माँ की याद दिलाता ।
फिर कौन होता जो सर्दियों में सुबह उठकर मुँह से भाप निकालता नयी नयी आकृतियाँ बनाता ।
और ठंडे पानी से नहाने के नाम पर अपने दांतो को कटकटाता ।
फिर कौन होता जो घर के सारे तकियों और चादरों को जोड़ अपना एक प्राइवेट रूम बनाता ।
और उसमें छोटी-सी टॉर्च जलाकर अपने भाई-बहनों को भूतों की कहानियाँ सुनाता ।
फिर कौन होता जो नानी दादी की कहानी में अपने लिए नए-नए किरदार ढ़ूँकता ।
और जो कुछ नहीं बोल पाते ऐसी बेजान बेज़ुबा वस्तुओं में भी जान फ़ूँकता ।
फिर कौन होता जो कागज के छोटे-छोटे टुकड़ों में अपने सीक्रेट छुपाता ।
और अपने सपनों को काँच के टुकड़ों में भी आईना दिखा चाँद से रेस लगाता ।
दरअसल यहां हम सब जितने भी हैं कुछ अधेड़ कुछ जवान कुछ युवा बच्चे हैं ।
पर हकीकत यही है कि यहां कुछ ही हैं जो सिर्फ बच्चे हैं ।
ये बच्चे हैं जनाब -
भोली सी मुस्कुराहट में अपनी सारी शैतानियां छुपा लेते हैं ।
और बड़ी से बड़ी समस्या हो तो भी छोटी-छोटी बातों में खुशियों का फल उगा लेते हैं ।
ये बच्चे न होते तो क्या होता ।
होता क्या ...
ये आँगन वीरान होता ।
न आप यहाँ होते, न मैं होता ।
इसलिए हमें फिर एक बार सोचना चाहिए कि यदि बच्चे न होते तो क्या होता ।
✍🏻 साकेत जैन 'शास्त्री' सहज
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