Monday, December 31, 2018

ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं......... राष्ट्रकवि रामधारी सिंह “ दिनकर ”

ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं.........
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह “ दिनकर ”

ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं
है अपनी ये तो रीत नहीं
है अपना ये व्यवहार नहीं
धरा ठिठुरती है सर्दी से
आकाश में कोहरा गहरा है
बाग़ बाज़ारों की सरहद पर
सर्द हवा का पहरा है
सूना है प्रकृति का आँगन
कुछ रंग नहीं , उमंग नहीं
हर कोई है घर में दुबका हुआ
नव वर्ष का ये कोई ढंग नहीं
चंद मास अभी इंतज़ार करो
निज मन में तनिक विचार करो
नये साल नया कुछ हो तो सही
क्यों नक़ल में सारी अक्ल बही
उल्लास मंद है जन -मन का
आयी है अभी बहार नहीं
ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं
ये धुंध कुहासा छंटने दो
रातों का राज्य सिमटने दो
प्रकृति का रूप निखरने दो
फागुन का रंग बिखरने दो
प्रकृति दुल्हन का रूप धार
जब स्नेह – सुधा बरसायेगी
शस्य – श्यामला धरती माता
घर -घर खुशहाली लायेगी
तब चैत्र शुक्ल की प्रथम तिथि
नव वर्ष मनाया जायेगा
आर्यावर्त की पुण्य भूमि पर
जय गान सुनाया जायेगा
युक्ति – प्रमाण से स्वयंसिद्ध
नव वर्ष हमारा हो प्रसिद्ध
आर्यों की कीर्ति सदा -सदा
नव वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा
अनमोल विरासत के धनिकों को
चाहिये कोई उधार नहीं
ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं
है अपनी ये तो रीत नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं

Sunday, December 30, 2018

कागज की कश्ती ........ढलान पर ........

कागज की नाव को पानी की ऊपरी सतह पर उतारना आसान होता है ।
पर उस कश्ती को नदिया पार ले जाना कठिन काम होता है ।
उस कागज की कश्ती को बनाना भी कोई आसान काम नहीं,
पर सीखने में बस थोड़ा ध्यान लगाना होता है ।
और शायद कागज की कश्ती बनाना, सीखने के बाद आसान होगा ।
लेकिन कागज बनाना अब भी मुश्किल काम होगा,
और आज की तारीक में शायद जंगल में जाकर पेड़ों को काटना
फिर उसकी लकड़ी से कागज बनाना इंसान के लिये आसान होगा,
किन्तु पेड़-पौधों को लगाना और जंगलों को बचाना अब शायद सबसे मुश्किल काम होगा ।
दोस्तों, यदि अब भी न चेते हम 
तो कागज की कश्ती तो दूर 
खुद की कश्ती को भी बचाना 
मुश्किल नहीं नामुमकिन काम  होगा ।

✍🏻 साकेत जैन शास्त्री 'सहज'

Saturday, December 29, 2018

कागज की कश्ती.......... कहीं कोई संदेश तो नहीं दे रही........?

कागज की कश्ती खुद पानी में गलकर भी बच्चों के चहरे पर मुस्कान ले आती है, हमारी यादों को ताजा कर जाती है । 
ऎसा करके वह कागज की कश्ती क्या कहना चाहती है...?, क्या हमें कोई संदेश देना चाहती है...?,
हाँ ! शायद यही उसका इरादा होगा, यही उसने विचारा होगा कि मुझे जन्म मिला है और शायद मेरा एक काम यह भी है कि मैं कश्ती बनकर पानी में तैर जाऊं और बच्चों के चेहरे पर हंसी बिखेरूं, इसीलिए मैं तो यह कार्य करके ही जाऊँगी, भले इसके लिये मुझे अपनी जान ही क्यों न गवानी पड़े, तूफानी बरसात के अन्दर पानी में उतरना पड़े, पर जन्मोपरान्त जो काम मिला है, उसे पूरा करना ही मेरा एकमात्र कर्तव्य है, शेष सर्व कार्य तो व्यर्थ हैं ।

मित्रों शायद हम भी आज अच्छी बातें, अच्छे मूल्यों व अच्छे संस्कारों का ज़िक्र तो बड़े शान से करते हैं, पर कहीं ना कहीं अपना ही काम न बिगड़ जाये इसलिये इन्हें अपनाने से डरते भी हैं, पर सच मानना हमें भी कागज की कश्ती की तरह पानी में उतरना होगा और अच्छी बातों को सिर्फ कहना ही नहीं, करना होगा ! नहीं तो ये अच्छी बातें सिर्फ बातें ही बनकर रह जायेगी, जिन्हें कोई याद भी करेगा की नहीं, क्या पता...?
तो सोचिए, विचारिए और निर्णय अवश्य करें ।

✍🏻 साकेत जैन शास्त्री 'सहज'

Friday, December 28, 2018

आओ ध्यान करके देखें

आज सुबह-सुबह एक घटना घट गयी बड़ी,
गर्म करने रखे दूध की रबड़ी बन गयी ।

हुआ यूं कि सुबह के समय मैं क्लास में बैठा था,
जहाँ बढ़ रही प्यास ने मुझे चारों ओर से ऐंठा था ।

अब बढ़ती हुयी प्यास, अंदर से इतनी बढ़ गयी थी कि मुझे क्लास से बीच में ही उठना पड़ा,
और अनचाहे मन से ही सही पर घर की ओर मुड़ना पड़ा ।

अब मैंने घर आकर पानी छानने को जैसे ही छन्ना उठाया
छन्ने के साथ-साथ मुझे रात का बचा दूध भी नज़र आया ।

तो सोचा, पानी के साथ दूध का काम भी निपटा लेते हैं,
दूध आग पर चढ़ाकर ही, पानी छान लेते हैं ।

पर बलिहारी है मेरे दिमाग की,
कि मैंने पानी तो छानकर पी लिया,
लेकिन दूध वहीं चूल्हे पर छोड़ अपनी अगली क्लास को हो लिया ।

अब ४०-४५ मिनट की क्लास पूरी करके हम जैसे ही घर आए,
सोचा, चलो रसोईघर में चलें, और कुछ खाएं ।

पर जब हम रसोईघर में गये तो वहाँ गज़ब ही हो गया था
क्योंकि अब वह दूध, दूध न रहकरके रबड़ी हो गया था ।

फिर क्या था, उस रबड़ी में हमने शक्कर मिलाई
और यार, दोस्तों के साथ बैठकर बड़े ही ठाट से खाई ।

लेकिन इस घटना से मुझे एक बात और समझ आई
कि दुनिया में न, हर काम ध्यान से ही होता है ।

इसलिए तो जब ध्यान नहीं होता तो एक कप चाय भी हम ढ़ग से नहीं बना पाते,
और जब ध्यान होता है तो बड़े बड़े कामों को भी चुटकियों में हैं निपटाते ।
दरअसल ये सब ध्यान की ही बलिहारी है जो कठिन से कठिन काम को आसान...
और आसान से आसान काम को भी कठिन बनाता है ।
इसलिए काम करें, आराम से... पर ध्यान से.....

✍🏻 साकेत जैन शास्त्री 'सहज'

Thursday, December 27, 2018

लघु नाटिका - कैसी हो हमारी एकता...?

पहला मित्र - क्या हम सब एक हैं ?

दूसरा मित्र - नहीं, नहीं हम एक कैसे हो सकते हैं मैं हिन्दू, तुम मुसल्मान, ये सिक्ख, ये ईसाई ; हम सभी अलग-अलग धर्मों को मानने वाले  हैं, इसलिए हम एक नहीं हो सकते हैं ।

तीसरा मित्र - अरे, अरे ! झगड़ते क्यों हो ; हम एक हैं भी और नहीं भी ।

पहला मित्र - वह कैसे ?

तीसरा मित्र - वह ऐसे कि हम सब मनुष्य हैं इसलिए एक हैं, यदि हम एक विचारधारा वाले हो जाएं तो भी हम एक कहलाएंगे फिर वह विचारधारा कैसी ही क्यों न हो ।
हां लेकिन एक बात जरूर है ...... और वो ये कि यदि हम गलत विचारधारा से एक हैं तो हमारी यह एकता ज्यादा दिन टिकने वाली नहीं है क्योंकि खोटे परिणाम आपस में ही एक दूसरे को काटते हैं जैसे बहुत क्रोध आ रहा हो जिसे, ऐसा दुकानदार भी लोभ परिणाम के चलते उस क्रोध परिणाम को निगल जाता है । अतः यदि हम अच्छी विचारधारा के साथ अपनी एकता को स्थापित करेंगे तो वह लम्बे काल तक सुदृढ़ और मजबूती के साथ सदा ही बनी रहेगी ।

दूसरा मित्र - और हम अलग कैसे ?

तीसरा मित्र - अरे ! जब हमारी विचारधाराएँ आपस में नहीं मिलती तब हम एक न होकर के अलग-अलग हो जाते हैं यही कारण तो है कि इतने विवाद, झगड़े इत्यादि होते रहते हैं ।
इसलिए हम सभी को आज से अपितु अभी से ही अच्छी विचारधारा वाले लोगों के साथ एकता स्थापित करनी चाहिए तभी सभी लोगों का विकास होगा, समाज उन्नति करेगा और देश पुनः एक विशव गुरु के रूप में सारे जहाँ में स्थापित होगा ।

✍🏻 साकेत जैन शास्त्री 'सहज'

Wednesday, December 26, 2018

स्नेह पगी पाती

दोस्तो, यह पत्र मैंने उन बच्चों के लिए लिखा था जिनको मैं साकेत इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ाया करता था । जब मैं वहाँ से लौटा तो यह पत्र उनके लिए मेरी तरफ से एक भेंट भर थी पर आज यह भेंट मैं सावर्जनिक कर रहा हूँ, तो आइए पढ़ते हैं स्नेह पगी पाती -

प्रिय छात्रो, प्यारे बच्चो !
दुनिया के इस रंगमंच पर मैं हमेशा से ही एक विद्यार्थी का किरदार निभा रहा हूँ और इसी किरदार को हमेशा निभाना चाहूँगा, शायद इसलिए कभी अपने आपको शिक्षक मान ही नहीं पाया, हमेशा ही बालकवत् सीखते रहने की चाह बनी रही............। 
अब दुनिया के इस रंगमंच पर आप कौनसा किरदार निभाना चाहते हैं, यह मुझे पता नहीं है पर जिस भी किरदार को निभाओ, उसे  अच्छाई और सच्चाई के साथ निभाना ; क्योंकि जो होना होता है न, वो होकर रहता है और जो कुछ भी होता है, वो अच्छे के लिए ही होता है ।

अब देखो कुछ बातें बता रहा हूँ, शायद जीवन में कभी काम आ जायें तो सब यहाँ ध्यान देना - 
पहली बात तो ये है कि जब भी किसी से कुछ सीखने का मौका मिले तो विनयपूर्वक व आदरभाव के साथ सीखना ।

और दूसरी बात यह कि जब कभी भी किसी को कुछ सिखाने का मौका मिले तो उसे वात्सल्यभाव पूर्वक सिखाना तभी सीखना-सिखाना सफल और सार्थक होगा ।

क्योंकि तीसरी बात यह है कि, जो डिग्रियाँ हैं न बच्चो ! वे तो हमारे शैक्षिक खर्चों की रसीदें मात्र हैं वास्तविक शिक्षा तो हमारे आचरण से ही झलकती है ।

इसलिए चौथी बात जो कही है कि "निर्माणों के पावन युग में हम चरित्र निर्माण न भूलें ।" इसे याद रखना और आप भी अपने चरित्र का निर्माण करना नहीं भूलना ।

चरित्र निर्माण के लिए आपको मेरी पांचवी बात का विशेष ध्यान रखना होगा और वो यह कि आप अपनी गलतियों को छिपाएं नहीं अपितु उन्हें मिटाने का उपाय करें ; क्योंकि बहुत बार हम अपने मम्मी-पापा, दादा-दादी या घर के अन्य सदस्यों से अपनी गलतियों को छिपाने की कोशिश करते हैं कारण कि हमें डर होता है कि वो हमें डांट लगाएँगे, पर उनकी डांट से हमारी गलतियाँ सुधर जाती हैं अन्यथा आगे जाकर वे ही गलतियाँ अपराध में बदल जाती हैं जिसका हमें और हमारे परिवार को बहुत बड़ा दण्ड भुगतना पड़ता है । इसलिए अपने आप को अपने परिवार के सामने दर्पणवत् पारदर्शी रखना ।

और हां ! पांचवी बात पर तभी अमल कर सकोगे जब मेरी यह छठी बात मानोगे और वो ये है कि इसके लिए अपनी संगति अच्छी रखना क्योंकि जैसी संगत होती है, वैसी रंगत होती है; और वैसे भी दोस्त, किताब, रास्ता और सोच गलत हो तो गुमराह कर ही देते हैं, इसलिए इनका चुनाव बहुत सावधानी से करना ।

बस, अब और क्या लिखूं ? अंत में एक सातवी बात और कह देता हूँ कि निश्चित तौर पर आप सब कामयाब होना चाहते हैं और उसके लिए ही अपनी काबिलियत बढ़ा रहे हैं, लेकिन याद रखना कि कामयाब होने के लिए मात्र काबिल होना काफी नहीं है, सही नज़रिया भी उतना ही जरूरी है, इसी नज़रिये की एक नज़ीर तो देखो कि उन्हें कामयाबी में सुकून नज़र आया तो वो दौड़ते गये और हमें सुकून में कामयाबी नज़र आयी तो हम ठहर गये । अब बोलो ! ऐसे नज़रिये तुम्हें गूगल पर कहां मिलेंगे, बच्चो ! ऐसे नज़रिये तो बड़े-बुजुर्गों के पास ही मिला करते हैं इसलिए कहा है कि - कुछ पल बैठा करो घर में बुजुर्गों के साथ, क्योंकि हर चीज़ गूगल पर नहीं मिला करती ।
और हां ! जिस हिसाब से तुम लोग बातें करते हो उसके लिए यह आठवी बात भी याद रख लेना कि एक सार्थक चुप्पी हमेशा अर्थहीन शब्द की तुलना में बेहतर होती है ।

तुमको लगता होगा कि कितना बोलते हैं ये, थकते नहीं हैं क्या ?........ वो तो हम जैसे बच्चे मिले हैं जो सुन लेते हैं........वरना । यदि ऐसा सोचते हो तो जाते-जाते साहिर लुधियानवी साहब का एक शेर सुनते जाओ, वे कहते हैं कि -
कल और आएंगे नगमों की, खिलती कलियाँ चुनने वाले ।
हमसे बेहतर कहने वाले, तुमसे बेहतर सुनने वाले ।।
आप सभी अपने जीवन में अनंत-अनंत सफलताएँ प्राप्त करें, यही शुभकामनाएँ शुभाशीष है ।

✍🏻 साकेत जैन शास्त्री 'सहज'

Tuesday, December 25, 2018

मैं तुमको क्या तर्पण कर दूं

आदरणीय मनोज जी 'मधुर' भोपाल जिनकी प्रेरणा व छाया में मैंने अपने साहित्यिक जगत की शुरुआत की आज जन्मदिन पर मैं उन्हें, उन्हीं की पंक्तियाँ समर्पित करता हूँ ।

सच मानिए ये ऐसी पंक्तियाँ है जो हमें कठिन समय पर हमेशा हमें संबल और सहारा देगा..........,
जन्मदिन की बहुत-बहुत बधाई, शुभकामनाएँ 


अहम का भाव का अनुचित जतन जब सिद्ध से हो तो ।
नुचेंगे पंख चिड़िया के चुनौती गिद्ध से हो तो ।
न जड़ता ओढ़ ले इतनी कि फिर से मुड़ नहीं पायें ।
न टूटें हम जड़ों से यूं कि फिर से जुड़ नहीं पायें ।

सबक पारा सिखाता है बिखरकर फिर सिमटने का ।
समय खुद हल बताता है समस्या से निपटने का ।
न जड़ता ओढ़ ले इतनी कि फिर से मुड़ नहीं पायें ।
न टूटें हम जड़ों से यूं कि फिर से जुड़ नहीं पायें ।


मामाजी ऐसी अद्भुत भेंट के लिए धन्यवाद और जन्मदिन की बहुत-बहुत बधाई, शुभकामनाएँ ।

Monday, December 24, 2018

" अरे ! जरा जज़्बात सम्हालना...... "

" अरे ! जरा जज़्बात सम्हालना...... "

हम सबमें जज़्बात होते हैं.........
हम सबके जज़्बात होते हैं........
....... होने भी चाहिए क्योंकि यदि जज़्बात न हों तो फिर मानव और मशीन में फर्क ही नहीं रह जायेगा इसलिए जज़्बातों का होना तो बनता है, स्वाभाविक भी है ।
हां पर हमें जज़्बातों में ज़्यादा बहना नहीं चाहिए क्योंकि कहा है न, कि यदि हम जज़्बातों में बह जाएंगे तो वे जज़्बात हमारे लिए स्टेटस बनकर रह जाएंगे  और दूसरों के लिए एन्टरटेनमेन्ट ।
अतः मेरा तो यही मानना है कि जज़्बात मतलब कि हमारा दिल व उसकी भावनाएं और जज़्बातों पर काबू रखने वाले अपने दिमाग इन दोनों का बहुत संतुलन होना चाहिए ।
आजकल यदि लोगों के जज़्बातों को देखें तो वे और भी स्वार्थपूर्ण हो गये हैं, यही कारण है कि वे अपने जज़्बातों की कद्र तो चाहते है पर इसके चक्कर में वे कभी-कभी उनके जज़्बातों की भी कद्र नहीं कर पाते जो उन्हें इस दुनिया में लाए,  जिन्होंने उन्हें दुनिया में हर कदम पर सम्हाला ।
और इसलिए गहराई से विचार करें कि यह स्वार्थपरता उनके पतन का ही कारण बनती है, उत्थान का नहीं ।
लेकिन यदि हम अपने साथ-साथ अन्यों के जज़्बातों की भी कद्र करने लग जायें तो यकीन मानिये ये समाज अपने आप ही तरक्की की नई ऊँचाईयों को छू लेगा ।
इस प्रसंग में हम और आप कहां खड़े है यह विचार करना आवश्यक है ? हम और आप समाज की इस तरक्की में अपना भरपूर योगदान दें यही मंगल भावना है ।

🖊 साकेत जैन शास्त्री 'सहज'

Sunday, December 23, 2018

क्या किस्मत भी हमारे हाथों में हो सकती है...?

क्या किस्मत भी हमारे हाथों में हो सकती है...?

देखें एक गज़ल -

राह में जो सुना मन में चलता रहा ।
सब खयालों को भी वह निगलता रहा ।

ये है उसकी कथा जिसने सब कुछ किया ।
हाथ फिर भी वो खाली ही मलता रहा ।

सबके छल छद्म सारे धरे रह गये ।
चाहा सबने रुके, फिर भी चलता रहा ।

सबने टोका बहुत कुछ न कर पायेगा ।
हार सबसे मिली फिर भी पलता रहा ।

साथ कोई नहीं ये तो सहनीय था ।
जो थे, उनका दगा, उसको खलता रहा ।

हो सफल वह, इसी के तो खातिर अरे ।
हर कदम पर वो खुद को बदलता रहा ।

उसकी किस्मत को देखूँ तो लगता मुझे ।
रात भर चाँदनी से भी जलता रहा ।

ऎसी किस्मत यदि हो किसी को मिली ।
समझो अपना ही दुष्कर्म फलता रहा ।

पूरी हो गई यहाँ, हां कथा आज पर ।
हार के भी 'सहज' वो सँभलता रहा ।

✍🏻 साकेत जैन शास्त्री 'सहज'

Saturday, December 22, 2018

विचारों का खेल : कबड्डी जैसा तो नहीं

विचारों का खेल : कबड्डी जैसा तो नहीं

मैं रोज सुबह उठता हूँ और रात को सो जाता हूँ, लेकिन सुबह उठने के बाद और रात को सोने से पहले, न जाने कितने ही विचारों से दिनभर में स्पर्शित होता हूँ । यूँ लगता है कि मानो विचारों और मेरे मन-मस्तिष्क के बीच कोई कबड्डी का मैच चल रहा हो जिसमें बहुत से विचार तो दिलोदिमाग को छूकर चले जाते हैं, लेकिन बहुत से विचारों को हमारे द्वारा इस मैच में हमारे दिलोदिमाग द्वारा धरदबोचा जाता है ; लेकिन यहाँ कबड्डी खेल के नियम नहीं चलते, विचारों और मन-मस्तिष्क के बीच चल रहे इस खेल के नियम थोड़े अलग है और अगर कबड्डी की अपेक्षा देखें तो नियम थोड़े उल्टे ही हैं ; क्योंकि, सामान्यतः जब कबड्डी में कोई सामने वाले को छूकर भाग जाता है तो जीतता है और यदि धरदबोचा जाये तो हारता है लेकिन विचारों की इस कबड्डी में जो हमारे दिलोदिमाग को छूकर भाग जाते है वो हार जाते है और जो विचार हमारे द्वारा धरदबोचे जाते हैं वे दिलोदिमाग पर छा जाते हैं जीत जाते हैं ।
मज़ेदार बात तो यह है कि जिस विचार को हम अपनाते है वह हमारा ही बन जाता है और मानो हमारी टीम में ही शामिल हो जाता है । अतः हमें हर एक विचार को दिलोदिमाग में नहीं चढ़ाना चाहिए अपितु जो विचार सकारात्मक, संस्कारात्मक , नैतिक, स्वाभाविक, अच्छे, सभ्य, सदाचारी, समझदारी, ईमानदारी वाले, समाज एवं राष्ट्र हित वाले हों, उन्हीं विचारों को अपने दिलोदिमाग में बसाना चाहिए है और फिर कभी नहीं छोड़ना है ; ताकि हमारी जो टीम है न, वो हमेशा मजबूत रहे, तभी जीवन के हर मैच में हमारी सही मायनों में जीत होगी । यदि गलत विचारों को अपनाकर उन्हें अपनी टीम में शामिल करेंगे तो उसका नतीजा भी हमें ही भुगतना पड़ेगा जो कि तनाव इत्यादि के रूप में हार से कम न होगा ।
इसलिये दोस्तों ज़िन्दगी के इस मैच को खेलने और उसमें अपनी टीम चुनने हेतु सावधानी जरूरी  है क्योंकि बड़े लोग कह गये हैं कि - "सावधानी हटी, दुर्घटना घटी ।" 

🖊 साकेत जैन शास्त्री

Friday, December 21, 2018

बेटी.... मां की परछाई ???

बेटी.... मां की परछाई ???

बेटी घर में जब भी आती, तो खुशियाँ भर कर लाती है ।
न जाने क्यों कुछ लोगों को, यह बात समझ न आती है ।
क्या-क्या उसने हां नहीं किया, अपने घर के खातिर बोलो ।
फिर भी घरवाले न समझे, हैं बोझ समझते बेटी को ।
लेकिन जब वह बेटी घर को, अपना सब कुछ दे जाती है ।
तब जाकर लोगों को शायद, यह बात समझ में आती है ।
रे ! बेटी घर से विदा हुई, फिर भी जो न समझे ये बात ।
वह निश्चित पैसों का लोभी, हां उसका होगा शीघ्र विनाश ।
बेटी से जग आगे बढ़ता, हां बेटी से ही सबकी शान ।
रे ! अब तो कद्र करो बेटी, की फिर होगी सच्ची पहचान ।

✍🏻 साकेत जैन शास्त्री 'सहज'


Thursday, December 20, 2018

कैसी होती है माँ ???

माँ,
वास्तव में कॊन है माँ  ?
दरअसल सच कहूं ,
तो एक नहीं दो है माँ
बस थोड़ा सा अन्तर है वो ये कि
पहली हमें इस संसार में लाती है
दूसरी हमें इस संसार से ले जाती है।
पहली हमें इस संसार में आगे बढ़ाती है
दूसरी हमें इस संसार से आगे बढ़ाती है ।
पहली हमारे दर्द को दबाती है
दूसरी हमारे दर्द को मिटाती है ।
पहली हमें सुलाती है
दूसरी हमें जगाती है ।
पहली तो किसी एक-दो की होती है माँ
पर दूसरी तो जग भर की होती है माँ।
पहली संसार में एक-दो को लाती है
पर दूसरी  संसार से अनंतों को ले जाती है।

✍🏻 साकेत जैन शास्त्री 'सहज'

धर्म और कुप्रथाएँ

कोई भी संस्कृति हमारे द्वारा सीखे गये विचार और विवेक के आधार पर आगे बढ़ती है जिसमें, विचार जो कि हमें दिशा देते है वह शास्त्रों के आधार ...