विचारों का खेल : कबड्डी जैसा तो नहीं
🖊 साकेत जैन शास्त्री
मैं रोज सुबह उठता हूँ और रात को सो जाता हूँ, लेकिन सुबह उठने के बाद और रात को सोने से पहले, न जाने कितने ही विचारों से दिनभर में स्पर्शित होता हूँ । यूँ लगता है कि मानो विचारों और मेरे मन-मस्तिष्क के बीच कोई कबड्डी का मैच चल रहा हो जिसमें बहुत से विचार तो दिलोदिमाग को छूकर चले जाते हैं, लेकिन बहुत से विचारों को हमारे द्वारा इस मैच में हमारे दिलोदिमाग द्वारा धरदबोचा जाता है ; लेकिन यहाँ कबड्डी खेल के नियम नहीं चलते, विचारों और मन-मस्तिष्क के बीच चल रहे इस खेल के नियम थोड़े अलग है और अगर कबड्डी की अपेक्षा देखें तो नियम थोड़े उल्टे ही हैं ; क्योंकि, सामान्यतः जब कबड्डी में कोई सामने वाले को छूकर भाग जाता है तो जीतता है और यदि धरदबोचा जाये तो हारता है लेकिन विचारों की इस कबड्डी में जो हमारे दिलोदिमाग को छूकर भाग जाते है वो हार जाते है और जो विचार हमारे द्वारा धरदबोचे जाते हैं वे दिलोदिमाग पर छा जाते हैं जीत जाते हैं ।
मज़ेदार बात तो यह है कि जिस विचार को हम अपनाते है वह हमारा ही बन जाता है और मानो हमारी टीम में ही शामिल हो जाता है । अतः हमें हर एक विचार को दिलोदिमाग में नहीं चढ़ाना चाहिए अपितु जो विचार सकारात्मक, संस्कारात्मक , नैतिक, स्वाभाविक, अच्छे, सभ्य, सदाचारी, समझदारी, ईमानदारी वाले, समाज एवं राष्ट्र हित वाले हों, उन्हीं विचारों को अपने दिलोदिमाग में बसाना चाहिए है और फिर कभी नहीं छोड़ना है ; ताकि हमारी जो टीम है न, वो हमेशा मजबूत रहे, तभी जीवन के हर मैच में हमारी सही मायनों में जीत होगी । यदि गलत विचारों को अपनाकर उन्हें अपनी टीम में शामिल करेंगे तो उसका नतीजा भी हमें ही भुगतना पड़ेगा जो कि तनाव इत्यादि के रूप में हार से कम न होगा ।
इसलिये दोस्तों ज़िन्दगी के इस मैच को खेलने और उसमें अपनी टीम चुनने हेतु सावधानी जरूरी है क्योंकि बड़े लोग कह गये हैं कि - "सावधानी हटी, दुर्घटना घटी ।"
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