आदरणीय मनोज जी 'मधुर' भोपाल जिनकी प्रेरणा व छाया में मैंने अपने साहित्यिक जगत की शुरुआत की आज जन्मदिन पर मैं उन्हें, उन्हीं की पंक्तियाँ समर्पित करता हूँ ।
सच मानिए ये ऐसी पंक्तियाँ है जो हमें कठिन समय पर हमेशा हमें संबल और सहारा देगा..........,
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| जन्मदिन की बहुत-बहुत बधाई, शुभकामनाएँ |
अहम का भाव का अनुचित जतन जब सिद्ध से हो तो ।
नुचेंगे पंख चिड़िया के चुनौती गिद्ध से हो तो ।
न जड़ता ओढ़ ले इतनी कि फिर से मुड़ नहीं पायें ।
न टूटें हम जड़ों से यूं कि फिर से जुड़ नहीं पायें ।
सबक पारा सिखाता है बिखरकर फिर सिमटने का ।
समय खुद हल बताता है समस्या से निपटने का ।
न जड़ता ओढ़ ले इतनी कि फिर से मुड़ नहीं पायें ।
न टूटें हम जड़ों से यूं कि फिर से जुड़ नहीं पायें ।
मामाजी ऐसी अद्भुत भेंट के लिए धन्यवाद और जन्मदिन की बहुत-बहुत बधाई, शुभकामनाएँ ।

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