धन्य था वह तेरस का दिन जब भगवान महावीर का अंतिम उपदेश दिव्यध्वनि के द्वारा भव्य जीवों ने श्रवण किया और उनमें भी धन्य थे वे लोग जिन्होंने उस उपदेश को सुनकर अपना आत्मकल्याण किया, जिन्होंने अपने ज्ञान में निज शुद्धात्म तत्त्व के दर्शन किए और अंतर की मस्ती में मस्त हि गये ।
निश्चित ही भगवान की वाणी का सार- जीव जुदा पुद्गल जुदा... ऎसी भेदज्ञान प्रगटाने वाला वीतराग विज्ञानमयी ही होगा । आइए, हम भी अपने जीवन में इस धन्यता को प्रकट करें । इस भेदज्ञान को प्रगट करके वीतराग-विज्ञानता को अपने उर में ऊर्ध्व कर भगवान महावीर के न सिर्फ सच्चे पथानुयायी बनें अपितु स्वयं उन जैसे बनेंं...............।
इसी मंगल भावना के साथ धन्य तेरस की आपको और आपके परिवार को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ ।
निश्चित ही भगवान की वाणी का सार- जीव जुदा पुद्गल जुदा... ऎसी भेदज्ञान प्रगटाने वाला वीतराग विज्ञानमयी ही होगा । आइए, हम भी अपने जीवन में इस धन्यता को प्रकट करें । इस भेदज्ञान को प्रगट करके वीतराग-विज्ञानता को अपने उर में ऊर्ध्व कर भगवान महावीर के न सिर्फ सच्चे पथानुयायी बनें अपितु स्वयं उन जैसे बनेंं...............।
इसी मंगल भावना के साथ धन्य तेरस की आपको और आपके परिवार को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ ।
✍ साकेत जैन शास्त्री 'सहज'
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