कागज की कश्ती खुद पानी में गलकर भी बच्चों के चहरे पर मुस्कान ले आती है, हमारी यादों को ताजा कर जाती है ।
ऎसा करके वह कागज की कश्ती क्या कहना चाहती है...?, क्या हमें कोई संदेश देना चाहती है...?,
हाँ ! शायद यही उसका इरादा होगा, यही उसने विचारा होगा कि मुझे जन्म मिला है और शायद मेरा एक काम यह भी है कि मैं कश्ती बनकर पानी में तैर जाऊं और बच्चों के चेहरे पर हंसी बिखेरूं, इसीलिए मैं तो यह कार्य करके ही जाऊँगी, भले इसके लिये मुझे अपनी जान ही क्यों न गवानी पड़े, तूफानी बरसात के अन्दर पानी में उतरना पड़े, पर जन्मोपरान्त जो काम मिला है, उसे पूरा करना ही मेरा एकमात्र कर्तव्य है, शेष सर्व कार्य तो व्यर्थ हैं ।
मित्रों शायद हम भी आज अच्छी बातें, अच्छे मूल्यों व अच्छे संस्कारों का ज़िक्र तो बड़े शान से करते हैं, पर कहीं ना कहीं अपना ही काम न बिगड़ जाये इसलिये इन्हें अपनाने से डरते भी हैं, पर सच मानना हमें भी कागज की कश्ती की तरह पानी में उतरना होगा और अच्छी बातों को सिर्फ कहना ही नहीं, करना होगा ! नहीं तो ये अच्छी बातें सिर्फ बातें ही बनकर रह जायेगी, जिन्हें कोई याद भी करेगा की नहीं, क्या पता...?
तो सोचिए, विचारिए और निर्णय अवश्य करें ।
✍🏻 साकेत जैन शास्त्री 'सहज'
सुन्दर
ReplyDeleteडाॅ अनेकांत कुमार जैन
धन्यवाद भाईसाहब
Deleteउत्तम
ReplyDeleteधन्यवाद
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