मेरी कलम उदास है, न जाने क्यों आज ।
शायद उसको ना मिला, मेरे मन का साथ ॥
जब मन से मन मिल गया, आये बहुत विचार ।
सोचा मन से ही करूँ, अपने मन की बात ॥
इष्ट-अनिष्ट विचार तो, सबके अंतर होय ।
चितवे लेकिन हित-अहित, जिन्हें प्राप्त मन होय ॥
जो मन के वश हो गया, हारे वह हर बार ।
मन जिसके वश में हुआ, जीते तीनों काल ॥
काम हमेशा हो सफल, जिसमें मन हो साथ ।
मन बिन मेहनत लाख हो, तो भी न हो काज ॥
न सुन्दर न ही बुरा, मन तो शीश समान ।
नीयत के रंग से बने, मन सुन्दर-हैवान ॥
सच में कितना सुखद है, प्रकृति का एहसास ।
जो मन अनुभव कर सके, ऐसा मन है खास ॥
मन ही मन अब मन कहे, चलो अब कहीं और ।
इसीलिए हम भी चले, देखन अगली ठौर ॥
✍🏻 साकेत जैन शास्त्री 'सहज'
Bhut badiya
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