Monday, January 21, 2019

धन्य होगा वह क्षण जब मैं भी ऐसा हो जाऊंगा ..............

अफसोस, कि मैं आचार्य कुन्दकुन्द देव जैसा, क्यों नहीं बन पाया ?
क्यों मैंने मानव तन को पाकर, उसे यूं ही व्यर्थ गवाया ?
आखिर क्यों मैं अबतक अपना कल्याण नहीं कर पाया ?
अफसोस, मैं उन जैसा क्यों नहीं बन पाया ?
देखो न,
वो पूर्व भव में ग्वाले थे, जंगल में लगी भीषण आग के बीच सुरक्षित वृक्ष की कोटर में उस ग्रंथ को जब वे घर ले आए तो मेरी तरह उन्हें तो कोई लालच का भाव नहीं आया ? अफसोस...
अरे जब वही ग्रंथ उन्होंने मुनिराज को भेंट किया तो उन्हें बहुत हर्षोल्लास हुआ पर मेरी तरह मान का भाव तो उन्हें नहीं आया ? अफसोस...
इस भव में वे ११ वर्ष की उम्र में मुनि बन गये, निज में रम गये ; अहा ऐसा लगता है बचपन का सही आनन्द बस उनने ही पाया, पर अफसोस...
वे ३३ वर्ष की उम्र में आचार्य बन गये, ज्ञानदान के सातिशय पुण्य से विदेह को भी गये, सीमंधर प्रभु की देशना सुन जब पुनः लौटे तो पूरा भारतवर्ष हरषाया, पर अफसोस...
वे तो करुणा बुद्धि कर सारा का सारा तत्त्वज्ञान हमें सौंप गये, पर मैं अभागा कि सौंपा गया अपने हित का ज़िम्मा भी कहां उठा पाया ? अफसोस...
लेकिन अब भी वक्त तो है न, क्यों न इस वक्त का सदुपयोग करूं !, तत्त्वाभ्यास-तत्त्व का चिंतन और मनन करूं !, क्यों न सच्ची वस्तु व्यवस्था, वस्तु स्वरूप को समझ भेदज्ञान करूं !
फिर उनके ही जैसे मैं भी अपना जीवन सफल बनाऊंगा, हां एक दिन ऐसा भी होगा जब मैं भी भगवान बन जाऊंगा ; और अब से लेकर तब तक मैं बस यही भावना भाऊं
कि निज में ही रम जाऊं
फिर जग में नहीं भ्रमाऊं
लघु नन्दन सिध्दों का बन
अब मुक्ति पुरी में जाऊं,
मैं मुक्ति पुरी में जाऊं ....।।

✍🏻 साकेत जैन शास्त्री 'सहज'

1 comment:

  1. पूर्निमा और अमावस्या

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