क्या किस्मत भी हमारे हाथों में हो सकती है...?
देखें एक गज़ल -
राह में जो सुना मन में चलता रहा ।
सब खयालों को भी वह निगलता रहा ।
ये है उसकी कथा जिसने सब कुछ किया ।
हाथ फिर भी वो खाली ही मलता रहा ।
सबके छल छद्म सारे धरे रह गये ।
चाहा सबने रुके, फिर भी चलता रहा ।
सबने टोका बहुत कुछ न कर पायेगा ।
हार सबसे मिली फिर भी पलता रहा ।
साथ कोई नहीं ये तो सहनीय था ।
जो थे, उनका दगा, उसको खलता रहा ।
हो सफल वह, इसी के तो खातिर अरे ।
हर कदम पर वो खुद को बदलता रहा ।
उसकी किस्मत को देखूँ तो लगता मुझे ।
रात भर चाँदनी से भी जलता रहा ।
ऎसी किस्मत यदि हो किसी को मिली ।
समझो अपना ही दुष्कर्म फलता रहा ।
पूरी हो गई यहाँ, हां कथा आज पर ।
हार के भी 'सहज' वो सँभलता रहा ।
✍🏻 साकेत जैन शास्त्री 'सहज'
This comment has been removed by the author.
ReplyDelete" बादशाह से पूछ बैठा कलंदर एकदिन,
ReplyDeleteसारी दुनिया क्यों छोड़ गया सिकंदर एकदिन,
सारे जहां ने देखा हाथ उसके खाली थे,
जो कहता था
मुट्ठियों में कैद कर लूंगा समंदर एकदिन,
....
साधुवाद मित्र