पुष्प सदा से ही बने, कामबाण के रूप ।जि
से जीत कर शिव गये, जाने कितने भूप ॥
भूप भये जो शिवपति, अपनाया शिव पंथ ।
भेदज्ञान की राह चल, बने वो सच्चे संत ॥
जैसे जल में जलज का, सदा ही रहता वास ।
फिर भी जल की बूंद को, छूता नहीं उदास ॥
बस यूँ ही मुनिराज है, रहते जग के बीच ।
फिर भी सदा विराजते, अपने आतम बीच ॥
हम भी चाहें सुख अगर, करें भेद विज्ञान ।
वरना सुख आभास में, करेंगे सुख का ज्ञान ॥
सब भव एक समान हैं, अगर न आतम ज्ञात ।
ज्यों समान है जगत में, तीन ढाक के पात ॥
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