Saturday, January 26, 2019

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ ..........

26 जनवरी, 1950, वो दिन जिस दिन हमारे देश में गणतंत्र की स्थापना हुई, लोकतंत्र की स्थापना हुई, हमारी अपनी शासन व्यवस्था की स्थापना हुई ।
गणतंत्र के तौर पर लागू किये गये संविधान की अपनी एक कहानी है । यह अपनी शुरुआत से लेकर २ साल, ११ महीने, १८ दिन का लम्बा प्रक्रिया से गुज़रता हुआ २६ जनवरी १९५० के दिन हमारे देश में लागू हुआ ।
जब इसे बनाना था तब इसके लिए संविधान सभा का निर्माण हुआ जिसमें ३८९ लोग शामिल थे पर आज़ादी के बाद देश दो भागों में बट गया और इस संविधान सभा में सिर्फ ३२४ लोग ही बचे । इसे बनाने में लगभग ६.४ करोड़ रुपये खर्च किये गये । जब यह बनकर तैयार हो गया तो इसके २२ भाग, ३९५ अनुच्छेद और ८ अनुसूचियां थी पर आज बहुत सारे संशोधनों के बाद इसमें २५ भाग, ३९५ अनुच्छेद और १२ अनुसूचियां हो गयी हैं।
गणतंत्र कहे, संविधान कहे या लोकतंत्र कहे यह कोई छोटी सी चीज़ नहीं है यह हर भारतवासी की ताकत है आज़ादी के बाद यह हमारी अपनी शासन प्रणाली है व्यवस्था है । लेकिन तब से लेकर अब तक हम इसे ठीक से जान नहीं पाए हैं इसी कारण आज़ादी के ७० साल बाद भी जनता का, जनता के लिए, जनता के द्वारा शासन इतना सशक्त और प्रभावशाली नहीं हो पाया ; और इसीकारण देश को मिली स्वतंत्रता धीरे-धीरे स्वच्छंदता में बदलती गयी । पर संविधान इतना मजबूत था कि इतनी स्वच्छंदता के बाद भी ७० सालों में भी अनेकता में एकता और एकता में अनेकता यही है भारत की विशेषता यह उक्ति फीकी नहीं पड़ी और आज भी भारत अनेक धर्म, जाति, बोली, भाषाओं, खानपान, पहनावा की विविध संस्कृति से सुशोभित होकर पूरे विश्व में अपना परचम फैला रहा है । हमारे इस गणतंत्र का क्या उद्देश्य है, हम इसे क्यों मनाते है इस बात को बताने वाली संविधान की उद्देश्यिका को आप सभी के रख रहा हूँ ।
मैं चाहूँगा कि आप सभी इस उद्देश्यिका को अपने-अपने ह्रदय में दोहराएं और इस गणतंत्र दिवस पर संकल्पकृत हो -
हम, भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को :
सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समानता प्राप्त कराने के लिए, तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करने वाली बंधुता के लिए दृढ़संकल्प होकर इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं ।
जय हिन्द, जय भारत ।

✍🏻 साकेत जैन शास्त्री 'सहज'

No comments:

Post a Comment

धर्म और कुप्रथाएँ

कोई भी संस्कृति हमारे द्वारा सीखे गये विचार और विवेक के आधार पर आगे बढ़ती है जिसमें, विचार जो कि हमें दिशा देते है वह शास्त्रों के आधार ...