बेटी.... मां की परछाई ???
बेटी घर
में जब भी आती, तो
खुशियाँ भर कर लाती है ।
न जाने
क्यों कुछ लोगों को, यह बात
समझ न आती है ।
क्या-क्या
उसने हां नहीं किया, अपने घर
के खातिर बोलो ।
फिर भी
घरवाले न समझे, हैं बोझ
समझते बेटी को ।
लेकिन जब
वह बेटी घर को, अपना सब
कुछ दे जाती है ।
तब जाकर
लोगों को शायद, यह बात समझ में आती है ।
रे !
बेटी घर से विदा हुई, फिर भी
जो न समझे ये बात ।
वह निश्चित पैसों का लोभी, हां उसका
होगा शीघ्र विनाश ।
बेटी से
जग आगे बढ़ता, हां बेटी
से ही सबकी शान ।
रे ! अब तो कद्र करो बेटी, की फिर होगी सच्ची पहचान ।
✍🏻 साकेत जैन शास्त्री 'सहज'
Good...keep it up...
ReplyDeleteThanks bhai
Delete🙏🙏🙏
ReplyDeleteThank you
DeleteVery nice, sir
ReplyDeleteसरस छे ।।
ReplyDeleteधन्यवाद
DeleteRight sir
ReplyDeleteधन्यवाद
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