Friday, December 21, 2018

बेटी.... मां की परछाई ???

बेटी.... मां की परछाई ???

बेटी घर में जब भी आती, तो खुशियाँ भर कर लाती है ।
न जाने क्यों कुछ लोगों को, यह बात समझ न आती है ।
क्या-क्या उसने हां नहीं किया, अपने घर के खातिर बोलो ।
फिर भी घरवाले न समझे, हैं बोझ समझते बेटी को ।
लेकिन जब वह बेटी घर को, अपना सब कुछ दे जाती है ।
तब जाकर लोगों को शायद, यह बात समझ में आती है ।
रे ! बेटी घर से विदा हुई, फिर भी जो न समझे ये बात ।
वह निश्चित पैसों का लोभी, हां उसका होगा शीघ्र विनाश ।
बेटी से जग आगे बढ़ता, हां बेटी से ही सबकी शान ।
रे ! अब तो कद्र करो बेटी, की फिर होगी सच्ची पहचान ।

✍🏻 साकेत जैन शास्त्री 'सहज'


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